🕊️ रेव. जॉन मैकआर्थर: सच्चाई के लिए खड़े रहने वाला एक निर्भीक बाइबल शिक्षक
रेव. जॉन मैकआर्थर, आधुनिक इंजील ईसाई जगत के सबसे प्रभावशाली बाइबल शिक्षकों और धर्मशास्त्रियों में से एक, अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने 86 वर्ष की आयु में कैलिफोर्निया के सांता क्लैरिटा में अंतिम सांस ली।
अपने पूरे जीवन में, मैकआर्थर ने बाइबल की पूर्णता, प्रभु यीशु मसीह की सर्वोच्चता और सच्चे धर्मोपदेश के महत्व को न केवल प्रचारित किया, बल्कि जी कर भी दिखाया।
📖 प्रचार नहीं, बाइबल का उद्घाटन
लॉस एंजिल्स स्थित ग्रेस कम्युनिटी चर्च से उन्होंने लगातार 50 वर्षों तक प्रचार किया — हफ्ते में कई बार, हर बार पूरी गंभीरता और अध्ययन के साथ।
उनका उपदेश हमेशा व्याख्यात्मक प्रचार (expository preaching) होता था — जहां वे बाइबल की किसी एक आयत या अंश को उसके ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संदर्भ में गहराई से समझाते थे।
उनकी शैली न तो आधुनिक ‘आकर्षक’ पद्धति पर आधारित थी, और न ही भावनात्मक कहानियों पर। उनका विश्वास था:
> “मन परिवर्तन मनोरंजन से नहीं, परमेश्वर के वचन से होता है।”
⚔️ जब सच्चाई बोलना जोखिम भरा हो
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, रेव. मैकआर्थर ने केवल बाइबल नहीं सिखाई, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी बाइबल आधारित दृष्टिकोण रखा।
उन्होंने क्रिटिकल रेस थ्योरी (CRT) का विरोध किया
“जागरूकता संस्कृति” (Woke Culture) को खतरनाक बताया
और कोविड-19 महामारी के दौरान सरकारी आदेशों के बावजूद चर्च खोलकर धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की
यहाँ तक कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें फोन कर उनके निर्णय का समर्थन किया।
⛪ मसीही जगत के अंदर भी आलोचना
रेव. मैकआर्थर ने सिर्फ़ दुनिया की आलोचना नहीं की, बल्कि मसीही समुदाय के अंदर फैली झूठी शिक्षाओं और भटकाव का भी खुलकर विरोध किया।
उन्होंने रोमन कैथोलिक धर्म की त्रुटियों को उजागर किया
समृद्धि सुसमाचार (Prosperity Gospel) और करिश्माई आंदोलनों की आलोचना की
और बेथ मूर, जोएल ओस्टीन, रॉबर्ट शूलर जैसे लोकप्रिय प्रचारकों को बाइबल के आधार पर चुनौती दी
उनका मानना था कि बिना सत्य के प्रेम अधूरा है, और बिना साहस के प्रचार निष्प्रभावी।
📚 एक अमिट विरासत
रेव. जॉन मैकआर्थर की किताबें, बाइबल कमेंट्री, सेमिनरी और उपदेश आने वाली पीढ़ियों को सिखाते रहेंगे कि सच्चाई की राह कठिन जरूर होती है, लेकिन वह प्रभु को प्रसन्न करती है।
उनकी विरासत केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उस जीवन में है जो उन्होंने प्रभु के लिए निःस्वार्थ रूप से जिया।