नई दिल्ली: उत्तर भारत में काम करने वाले मिशनरियों और ईसाई समुदाय के खिलाफ कुछ राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए धर्मांतरण कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि इस कानून के कई प्रावधान अस्पष्ट और असंवैधानिक हैं।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि यह कानून मिशनरियों और ईसाई समुदाय के खिलाफ दुरुपयोग किया जा सकता है और निर्दोष लोगों को फंसाया जा सकता है। उनका कहना है कि जबरन धर्मांतरण के खिलाफ पहले से ही कड़े कानून हैं, इसलिए नए कानूनों की आवश्यकता नहीं है।
धर्मांतरण कानून की अस्पष्टता: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस कानून के कई प्रावधान अस्पष्ट हैं और इसके दुरुपयोग की संभावना है।
– *मिशनरियों और ईसाई समुदाय का उत्पीड़न*: याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस कानून का उपयोग मिशनरियों और ईसाई समुदाय के खिलाफ किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकारों से जवाब तलब किया है और इस कानून की वैधता की जांच कर रही है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि ये कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 25 के तहत प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। इन अनुच्छेदों के तहत, नागरिकों को अपने धर्म को मानने और प्रचार करने का अधिकार है। हालांकि, ये कानून अधिकारियों को उन लोगों को अपराधी बनाने के लिए अत्यधिक अधिकार देते हैं जो अपने धर्म का प्रचार करते हैं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ये कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 25 का उल्लंघन करते हैं।
– धर्म प्रचार का अधिकार: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नागरिकों को अपने धर्म को मानने और प्रचार करने का अधिकार है, लेकिन ये कानून इस अधिकार को सीमित करते हैं।
याचिका में यह भी कहा गया है कि आदिवासी समुदायों को जबरन हिंदू धर्म में परिवर्तित करने के लिए कुछ हिंदूवादी संगठनों द्वारा किए जा रहे प्रयासों को इस कानून के तहत अपराध नहीं माना जाता है, जबकि वास्तव में जबरन धर्मांतरण इन्हीं प्रयासों में हो रहा है।